हिंदी साहित्य में अति पिछड़ों की आवाज़ अब भी इतनी कम क्यों है?
मैंने हिंदी की एक महत्वपूर्ण पत्रिका 'आलोचना' के हाल के लगभग दस अंकों का अध्ययन किया और विशेष रूप से उसके तीन कविता विशेषांकों को देखा. वहां लगभग तीस कवियों की कविताएं प्रकाशित हुईं, लेकिन उनमें अति पिछड़ी जातियों से आने वाला कोई स्पष्ट प्रतिनिधि नाम दिखाई नहीं देता.
यह The Wire Hindi की एक रिपोर्ट का छोटा अंश है। पूरा पाठ प्रकाशक के पास रहता है — उसे वहीं पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं।
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