ख़ाली हाथों सी यह काया: मानो कवि के साथ पैदल चलना
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ध्रुव शुक्ल के नए कविता संग्रह ‘ख़ाली हाथों सी यह काया’ को पढ़ते हुए लगता है कि आप इस कवि के साथ पैदल चल रहे हैं. कविता में साथ चलने-चलाने का भाव है. साथ चलाने वाला कवि कभी उलाहना देता है, हमारी लाचारी का मज़ाक उड़ता है, कभी धीरे से डांट-डपट भी देता है.
यह The Wire Hindi की एक रिपोर्ट का छोटा अंश है। पूरा पाठ प्रकाशक के पास रहता है — उसे वहीं पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं।
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