मजरूह सुल्तानपुरी, जिन्हें नेहरू के खिलाफ लिखने पर जेल हुई:पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा..., पहला नशा..., जैसे गाने लिखे, आखिरी गाना शाहरुख पर
‘मैं अकेले ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।’ इन पंक्तियों को सुनकर लगता है कि इन्हें लिखने वाला शख्स शायद जिंदगी की गहराइयों में डूबा कोई बेहद संजीदा और गंभीर शायर होगा।
यह Dainik Bhaskar की एक रिपोर्ट का छोटा अंश है। पूरा पाठ प्रकाशक के पास रहता है — उसे वहीं पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं।
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